बार-बार आने वाली आपदाएं, जैसे कि फ्लैश बाढ़ और भूस्खलन, यह स्पष्ट रूप से दिखाती हैं कि एक बार फिर पर्यावरणीय चेतना की सख्त जरूरत है, इसे आजकल ‘चिपको 2.0’ कहा जा रहा है।
सुंदरलाल बहुगुणा का मूल नारा “पारिस्थितिकी ही स्थायी अर्थव्यवस्था है” आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
Molyar Resource Foundation की अपील —
Chipko2.0 – हिमालय बचाओ अभियान :
हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता के दो मुख्य कारण हैं:
जलवायु परिवर्तन: तापमान में वृद्धि, ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, भीषण वर्षा
अनियंत्रित मानवीय दबाव: अवैज्ञानिक निर्माण कार्य, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स (जैसे बड़े-बड़े बांध, चारधाम मार्ग), #वनों की कटाई, और नाजुक पहाड़ी ढलानों का असंतुलन।
आज के हालात फिर उसी चिंता को दिखा रहे हैं जिसने मूल चिपको आंदोलन को जन्म दिया, लेकिन अब यह और भी बड़े एवं गंभीर पैमाने पर है:
पर्यावरणीय नाजुकता बनाम अधोसंरचना: विकास एवं कनेक्टिविटी के नाम पर होने वाली रोड कटिंग, टनलिंग, और पहाड़ों की खुदाई प्राकृतिक जल अपवाह व्यवस्था में बाधा डालती है, जिससे भूस्खलन और फ्लैश फ्लड का जोखिम बढ़ता है।
स्थानीय, वन-आश्रित समुदाय सबसे पहले और सर्वाधिक प्रभावित होते हैं—जिंदगियाँ, घर, और आजीविका सबकुछ दांव पर लग जाता है।
मूल चिपको ने स्थानीय ज्ञान और सहभागिता को महत्व दिया था। आज के ‘चिपको 2.0’ में स्थानीय, भागीदारी आधारित विकास योजना और आदिवासी संरक्षण विधियों को प्राथमिकता देनी होगी।
चिपको 2.0 का विस्तार:
समग्र पारिस्थितिकीीय सक्रियता: सिर्फ पेड़ों की सुरक्षा नहीं, बल्कि नदियों, ग्लेशियरों और पूरे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा।
सतत विकास की मांग: जलवायु न्याय, पारिस्थितिकीय लचीलापन, इको-फ्रैंडली टूरिज्म, और आजीविका के लिए संरक्षण-मूलक ग्रामीण अर्थव्यवस्था।
नीति और जवाबदेही: सभी बड़ी परियोजनाओं के लिए सख्त और निष्पक्ष पर्यावरणीय आकलन, भूमि उपयोग नियमों का पालन, और सामुदायिक नेतृत्व वाली निर्णय प्रक्रिया की स्थापना।
तकनीकी समावेशन: आधुनिक डिजिटल अभियान, कानूनी एवं वैज्ञानिक आधार, मीडिया एवं सांस्कृतिक प्रभाव, और विभिन्न हितधारकों की भागीदारी।
आज के संदर्भ में हिमालय व वहाँ के निवासियों के लिए नए दौर का ‘चिपको 2.0’ आंदोलन आवश्यक है, यह आन्दोलन सशक्त, समावेशी और विज्ञान-संस्कृति-जन भागीदारी पर केंद्रित होना चाहिए।



